शुक्रवार, 27 मार्च 2015

हरिवंशराय बच्चन की कुछ चुनिंदा कविताएँ जो मुझे काफ़ी पसंद हैं...

हरिवंशराय बच्चन की कुछ चुनिंदा कविताएँ जो मुझे काफ़ी पसंद हैं ...




कोशिश करने वालों की हार नहीं होती (हरिवंशराय बच्चन)
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

अग्नि पथ (हरिवंशराय बच्चन)
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!


जो बीत गई सो बात गई (हरिवंशराय बच्चन)
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर 
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं! (हरिवंशराय बच्चन)
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी की घडियों को किन-किन से आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

याद सुखों की आसूं लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

दोनो करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं!

पथ की पहचान (हरिवंश राय बच्चन )
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा, व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ? (हरिवंशराय बच्चन)
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

उस पार न जाने क्या होगा! (हरिवंशराय बच्चन)
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 
यह चाँद उदित होकर नभ में 
कुछ ताप मिटाता जीवन का, 
लहरा लहरा यह शाखाएँ 
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ 
हँसकर कहती हैं मगन रहो, 
बुलबुल तरु की फुनगी पर से 
संदेश सुनाती यौवन का, 
तुम देकर मदिरा के प्याले 
मेरा मन बहला देती हो, 
उस पार मुझे बहलाने का 
उपचार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

जग में रस की नदियाँ बहती, 
रसना दो बूंदें पाती है, 
जीवन की झिलमिलसी झाँकी 
नयनों के आगे आती है, 
स्वरतालमयी वीणा बजती, 
मिलती है बस झंकार मुझे, 
मेरे सुमनों की गंध कहीं 
यह वायु उड़ा ले जाती है; 
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, 
ये साधन भी छिन जाएँगे; 
तब मानव की चेतनता का 
आधार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

प्याला है पर पी पाएँगे, 
है ज्ञात नहीं इतना हमको, 
इस पार नियति ने भेजा है, 
असमर्थबना कितना हमको, 
कहने वाले, पर कहते है, 
हम कर्मों में स्वाधीन सदा, 
करने वालों की परवशता 
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही 
कुछ दिल हलका कर लेते हैं, 
उस पार अभागे मानव का 
अधिकार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

कुछ भी न किया था जब उसका, 
उसने पथ में काँटे बोये, 
वे भार दिए धर कंधों पर, 
जो रो-रोकर हमने ढोए; 
महलों के सपनों के भीतर 
जर्जर खँडहर का सत्य भरा, 
उर में ऐसी हलचल भर दी, 
दो रात न हम सुख से सोए; 
अब तो हम अपने जीवन भर 
उस क्रूर कठिन को कोस चुके; 
उस पार नियति का मानव से 
व्यवहार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

संसृति के जीवन में, सुभगे 
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी, 
जब दिनकर की तमहर किरणे 
तम के अन्दर छिप जाएँगी, 
जब निज प्रियतम का शव, रजनी 
तम की चादर से ढक देगी, 
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी 
कितने दिन खैर मनाएगी! 
जब इस लंबे-चौड़े जग का 
अस्तित्व न रहने पाएगा, 
तब हम दोनो का नन्हा-सा 
संसार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

ऐसा चिर पतझड़ आएगा 
कोयल न कुहुक फिर पाएगी, 
बुलबुल न अंधेरे में गागा 
जीवन की ज्योति जगाएगी, 
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर 
मरमरन सुने फिर जाएँगे, 
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन 
करने के हेतु न आएगी, 
जब इतनी रसमय ध्वनियों का 
अवसान, प्रिये, हो जाएगा, 
तब शुष्क हमारे कंठों का 
उद्गार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा! 

सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन 
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन, 
निर्झर भूलेगा निज टलमल’,
सरिता अपना कलकलगायन, 
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं, 
चुप हो छिप जाना चाहेगा, 
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे 
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण; 
संगीत सजीव हुआ जिनमें, 
जब मौन वही हो जाएँगे, 
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का 
जड़ तार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 

उतरे इन आखों के आगे 
जो हार चमेली ने पहने, 
वह छीन रहा, देखो, माली, 
सुकुमार लताओं के गहने, 
दो दिन में खींची जाएगी 
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी, 
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा 
पाएगा कितने दिन रहने; 
जब मूर्तिमती सत्ताओं की 
शोभा-सुषमा लुट जाएगी, 
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का 
श्रृंगार न जाने क्या होगा! 
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा! 


दृग देख जहाँ तक पाते हैं, 
तम का सागर लहराता है, 
फिर भी उस पार खड़ा कोई 
हम सब को खींच बुलाता है; 
मैं आज चला तुम आओगी 
कल, परसों सब संगीसाथी, 
दुनिया रोती-धोती रहती, 
जिसको जाना है, जाता है; 
मेरा तो होता मन डगडग, 
तट पर ही के हलकोरों से! 
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा 
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा!

तोड़ती पत्थर (कविता) - सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

तोड़ती पत्थर (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

वह तोड़ती पत्थर


देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर --


वह तोड़ती पत्थर ।



कोई न छायादार


पेड़, वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;


श्याम तन, भर बँधा यौवन,


गुरु हथौड़ा हाथ


करती बार बार प्रहार;


सामने तरु - मालिका, अट्टालिका, प्राकार ।



चड़ रही थी धूप


गरमियों के दिन


दिवा का तमतमाता रूप;


उठी झुलसाती हुई लू


रुई ज्यों जलती हुई भू


गर्द चिनगी छा गयी


प्रायः हुई दुपहर,


वह तोड़ती पत्थर ।



देखते देखा, मुझे तो एक बार


उस भवन की ओर देखा छिन्न-तार


देखकर कोई नहीं


देखा मुझे उस दृष्टि से


जो मार खा रोयी नहीं


सजा सहज सितार,


सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार ।


एक छन के बाद वह काँपी सुघर,


दुलक माथे से गिरे सीकार,


लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा --


"मैं तोड़ती पत्थर"|